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कुछ इस तरह से वो मुस्कुराते हैं,
कि परेशान लोग उन्हें देख कर खुश हो जाते हैं,
उनकी बातों का अजी क्या कहिये,
अल्फ़ाज़ फूल बनकर होंठों से निकल आते हैं।
ख़ुद न छुपा सके वो अपना चेहरा नक़ाब में,
बेवज़ह हमारी आँखों पे इल्ज़ाम लग गया।।
हैं होंठ उसके किताबों में लिखी तहरीरों जैसे,
ऊँगली रखो तो आगे पढ़ने को जी करता है।
हुस्न वालों को संवरने की क्या जरूरत है,
वो तो सादगी में भी क़यामत की अदा रखते हैं।
मस्त नज़रों से देख लेना था अगर तमन्ना थी आज़माने की,
हम तो बेहोश यूँ ही हो जाते क्या ज़रूरत थी मुस्कुराने की?
ये चाँद सा रोशन चेहरा जुल्फों का रंग सुनहरा,
ये झील सी नीली आंखे कोई राज हैं इनमे गहरा,
तारीफ़ करू क्या उसकी जिसने तुम्हे बनाया।।
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